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शुक्रवार, 18 जून 2010

किसानों को भुगतना पड़ रहा खामियाजा

-ऋण का मामला
-केंद्र को भेजे प्रस्ताव को मंजूरी नहीं
-पंजाब सरकार ने केंद्र से जताया रोष
बठिंडा। आम तौर पर बेहतर काम करने वालों को पुरस्कृञ्त तो किया जाता है, लेकिन सहकारी क्षेत्र में अच्छा काम के  लिए एक तरह से सजा भुगतनी पड़ रही है। पंजाब के  सहकारी बैंकों व सोसायटियों के  ऋञ्ण की वापसी देश के अन्य राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसी के  चलते राज्य को केंञ्द्र सरकार से मिलने वाले पैसों में बड़ा कट लगाया जा रहा है और पंजाब सरकार के ऋञ्ण माफी के  लिए केंद्र को भेजे प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल पा रही है। पंजाब सरकार ने इस नीति के खिलाफ केंद्र से कई बार रोष भी जताया है। नीति के अनुसार जिस राज्य में सहकारी ऋण के जितने ज्यादा डिफाल्टर होंगे उस राज्य को केंद्र से उतनी ही ज्यादा सहायता मिलती है। इसका मूल कारण ऋण में डूबे किसानों को राहत देना है। पंजाब के किसानों को ऋण माफी के मामले में राहत इसलिए नहीं मिल पा रही है क्योंकि यहां सहकारी व कामर्शियल बैंकों का डिफाल्टर रेट अन्य राज्यों से काफी कम है। राजस्व विभाग की वित्तायुक्त रोमिला दूबे ने को बताया कि राज्य सरकार ऋण में राहत के  लिए कई बार प्रस्ताव केंद्र को भेज चुकी है, लेकिन राहत नहीं मिल पा रही है, क्योंकि तर्क यह दिया जाता है कि किसानों की ऋण वापस करने की क्षमता के कारण फिलहाल विदर्भ जैसी स्थिति नहीं आई है। 

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि  पंजाब सरकार ने किसानों के  सिर पर 24,500 करोड़ रुपये के  बोझ का प्रस्ताव भेजा था। इसमें 12 हजार करोड़ रुपये के  करीब आढ़तियों व अन्य बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं का है। राज्य सरकार ने वनटाइम सेटलमेंट और आढ़तियों के  ऋण से निकालने के  लिए आर्थिक  सहायता की मांग की थी लेकिन कुञ्छ नहीं मिला। आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र को डिफाल्टर किसानों के कारण तीन-तीन हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं, जबकि  पंजाब को केवल 80 करोड़ मिला है। कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हालांकि पंजाब के किसानों की ऋण वापस करने की योग्यता आमदनी के कारण नहीं है बल्कि उत्पादन लागत बढऩे के कारण पंजाब सरकार की ओर से प्रत्येक वर्ष पांच सौ से एक  हजार रुपये तक बढ़ाई जाने वाली ऋण की लिमिट के कारण ऐसा हो रहा है। किसानों से पैसा भरवाकर अगले ही दिन बढ़ी लिमिट के हिसाब से उसे ऋण दे दिया जाता है। एक  तरह से यह नए-पुराने ही किए जाते हैं। यही तरीका किसानों के गले की फांस बन गया है।

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