सोमवार, 31 मई 2021

पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय में 'राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार, महाराणा प्रताप एवं गीता' विषय पर ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन


- इस कार्यक्रम में देश भर के प्रशंसित शिक्षाविदों और विद्वानों ने भाग लिया

बठिंडा: पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा (सीयूपीबी) में 30 मई, 2021 को 'राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार, महाराणा प्रताप एवं गीता' के विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में दौरान प्रख्यात शिक्षाविदों ने संगोष्ठी के विषय पर प्रतिभागियों का ज्ञानवर्धन किया। इस अवसर पर भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय, सोनीपत (बीपीएसएमवी, सोनीपत) की कुलपति प्रो. सुषमा यादव मुख्य अतिथि के रूप में, महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा (एमजीएएचवी, वर्धा) के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल सारस्वत अतिथि के रूप में और डॉ. राजेंद्र पेंसिया (आईएएस) विशिष्ट अतिथि के रूप में इस कार्यक्रम सम्मिलित हुए। वहीँ, भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान, दिल्ली के संस्थापक अध्यक्ष श्री राम कृष्ण गोस्वामी ने इस कार्यक्रम का प्रास्ताविक एवं बीज वक्तव्य दिया।

इस कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष श्री राम कृष्ण गोस्वामी के बीज वक्तव्य के साथ हुई। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए श्री राम कृष्ण ने 'राष्ट्रीय सुरक्षा' और 'मानवाधिकार' की अवधारणा पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। उन्होंने कहा कि 'श्रीमद्भगवदगीता' ने हमें धर्म के मार्ग पर चलना, आत्म-साक्षात्कार के लिए ध्यान करना और अनुशासित जीवन जीना सिखाया है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि पवित्र ग्रंथ गीता की शिक्षाओं से प्रेरित होकर, महाराणा प्रताप ने अपने राज्य को अकबर के अत्याचारों से बचाया और मानव अधिकारों को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हमें बड़े उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किसी भी नीति को बनाते समय 'सभी के लिए न्याय' सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपने विचार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा कि मानवाधिकार केवल उनके लिए होना चाहिए जो एक दूसरे का सम्मान करते हैं और मानवता के मार्ग पर चलते हैं।


कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि प्रो. रजनीश शुक्ल, कुलपति, एमजीएएचवी, वर्धा ने कहा कि जब भी धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष होता है तो राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों का प्रश्न,  प्रचलित परिदृश्य में चर्चा के लिए बहुत उपयुक्त हो जाता है। इन मुद्दों को हल करने के लिए हमें श्रीमद्भगवदगीता का मार्गदर्शन लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा हमारे प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों जैसे सत्य, स्नेह, दया, बलिदान आदि में निहित है। इन सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करके राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों को सुनिश्चित किया जा सकता है। प्रो. शुक्ल ने कहा कि लोग महाराणा प्रताप को उनके राज्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद रखेंगे।


विशिष्ट अतिथि डॉ. राजेंद्र पेंसिया (आईएएस) ने कहा कि महाराणा प्रताप की बहादुरी की कहानी दुनिया में कई लोगों के लिए अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरणा का एक प्रमुख स्रोत बन गई है। उन्होंने साझा किया कि महाराणा प्रताप ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि युवा पीढ़ी को महाराणा प्रताप के जीवन से सबक लेने और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने की जरूरत है।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि, प्रो. सुषमा यादव, कुलपति, बीपीएसएमवी, सोनीपत ने अपने व्याख्यान के दौरान भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में 'धर्म और कर्म' के सिद्धांत, 'मानवाधिकार' और 'देशभक्ति' की व्यापक अवधारणा पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने रेखांकित किया कि गीता, रामायण, ऋग्वेद और अन्य पवित्र शास्त्रों ने हमेँ एक अच्छे इंसान के गुणों के बारे में मार्गदर्शन प्रदान किया है, जिनका पालन करके सभी के बुनियादी मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चेतना देशभक्ति के आधार के रूप में कार्य करती है। इसी राष्ट्रीय चेतना और देश भक्ति की भावना से ओत-प्रोत होकर महाराणा प्रताप के नेतृत्व में उनकी सेना के प्रत्येक सैनिक ने हल्दीघाटी की लड़ाई (1576) और देवर की लड़ाई (1582) एक योद्धा की तरह लड़ी। उन्होंने कहा कि मातृभूमि और मानवता की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप की नि:स्वार्थ सेवा हमारी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।


अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी ने कहा कि भारत की मूल शक्ति इसकी 'विविधता में एकता' और संतों, दस गुरुओं एवं समाज सुधारकों द्वारा प्रदान की गई 'पारंपरिक ज्ञान प्रणाली' में निहित है जिसने हमें विश्व बंधुत्व, वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः के सूत्र दिए हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि हमारी सांस्कृतिक परंपराओं, सभ्यता और प्राचीन शास्त्रों ने हमें एक-दूसरे के अधिकारों का गरिमामय ढंग से सम्मान करना और प्रकृति के साथ सद्भाव में रहना सिखाया है। वर्तमान संदर्भ में महाराणा प्रताप के मिशन को पूरा करने के लिए, प्रो. तिवारी ने युवा पीढ़ी से जीवन के विभिन्न पहलुओं में भारत की समृद्ध संस्कृति और परंपरा के बारे में जागरूक होने का आग्रह किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार सुनिश्चित करने के लिए मातृभूमि के लिए प्यार और सम्मान आवश्यक है, और 'भगवत गीता' निस्संदेह राज धर्म और नागरिक धर्म का स्रोत है।


कार्यक्रम का संचालन डॉ. बावा सिंह, विभागाध्यक्ष, दक्षिण और मध्य एशियाई अध्ययन विभाग, द्वारा किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में डीन प्रभारी अकादमिक प्रो. आर.के. वुसिरिका ने स्वागत भाषण दिया। इसके बाद, डॉ. राजेंद्र कुमार सेन ने कार्यक्रम के आमंत्रित वक्ताओं का परिचय कराया। अंत में, डीन छात्र कल्याण प्रो. वी.के. गर्ग ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यक्रम में पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने भाग लिया। पंजाब, मध्य प्रदेश, मिजोरम, उड़ीसा और देश के अन्य राज्यों के शिक्षक, छात्र और समाज सुधारक भी आभासी पटल के माध्यम से इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।

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